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महात्मा गांधी

ब्रह्मचर्य के प्रयोग

by Dayashankar Shukla Sagar

Hindi 1 edition

वे शायद 2002 के सर्दियों के दिन थे। मशहूर पत्रकार और चिंतक प्रभाष जोशीजी लखनऊ में मेरे घर आये थे। मैं बड़े उत्साह से उन्हें घर की दूसरी मंजिल पर ले गया। मेरा एक छोटी-सी निजी लाइब्रेरी है। प्रभाषजी किताबों से लकदक शीशे की अलमारियों में करीने से रखो किताबों को सरसरी निगाह से देख रहे थे। इनमें अधिकांश दुर्लभ और ऐसी पुरानी किताबें थीं जो अब अप्राप्त हो चुकी हैं। इतिहास, दर्शन, साहित्य, भाषा, मनोविज्ञान, संस्कृति, विश्व प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएँ और भी न जाने क्या-क्या। तकरीबन 10 मिनट तक किताबों की अलमारियों में झाँकते हुए उन्होंने पूछा- "इनमें गांधीजी की कोई किताब नहीं दिख रही। ऐसा क्यों?" मेरे पास कोई जवाब नहीं था। गांधीजी के बारे में इतना लिखा जा चुका था कि कोई क्या पढ़े और क्या छोड़े। सच कहूँ तो उन दिनों में गांधीजी कभी मेरी रुचि का केन्द्र नहीं रहे। उन्होंने कहा- "तुम सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मँगा लो और पूरा पढ़ डालो, तब अपन बात करेंगे।" गांधी वाङ्‌मय यानी सौ खण्ड। मैंने उसी दिन नयी दिल्ली के प्रकाशन विभाग को "महात्मा गांधी कलेक्टेड वर्क्स" के सौ ग्रन्थों को खरीदने का आर्डर भेज दिया। इन ग्रन्थों को पढ़ने के बाद मैं अब वह नहीं रह गया जो इन किताबों को पढ़ने से पहले था। भारतीय इतिहास के उस एक गजब के किरदार से मेरा वास्तविक परिचय हुआ था जिसका नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। किसी भी ऐतिहासिक किरदार को समझने के दो तरीके हैं। एक आप वह पढ़िए जो उसके बारे में किसी और ने लिखा है या फिर वह पढ़िए जो उसने ख़ुद लिखा है या उसके इर्द-गिर्द जमा लोगों ने उसके बारे में लिखा है। यानी 'फर्स्ट हैंड इंफॉरमेशन'। गांधी ने जो पत्र अपने निजी मित्रों को लिखे (जो उनके जीवित रहते सार्वजनिक नहीं हुए थे।) मैंने उसके सन्दर्भों की भी गहरी पड़ताल की। गांधी वाङ्मय में संग्रहित पत्रों को आप बिना सन्दर्भ के नहीं समझ सकते। यह गांधीयन विचारधारा का एक ऐसा गहरा समुद्र है जिसमें बिना मन्थन किये आप कुछ हासिल नहीं कर सकते। इस समुद्र मन्थन से अमृत भी निकलता है और विष भी। इसी सागर मन्थन से यह किताब निकली, जो इस वक्त आपके हाथ में है। Categories: Vani Prakashan, Biography Mahatma Gandhi : Brahmcharya Ke Prayog is available from Vani Prakashan. Explore this book and discover more titles from the Vani Prakashan collection.

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This edition

Publisher Vani Prakashan
ISBN9788181436405

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1 edition

Vani Prakashan Cover of महात्मा गांधी, Vani Prakashan edition
—ISBN 9788181436405
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Titleमहात्मा गांधी
LanguageHindi
Editions1
PublishersVani Prakashan

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