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हंसबलाका

by Acharya Janaki Vallabha Shastri

Hindi 1 edition

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री छायावादोत्तर युग के प्रसिद्ध कवि थे। प्रारंभ में वे संस्कृत में कविताएँ लिखते थे। संस्कृत में लिखी उनकी कविताओं का प्रथम संग्रह 'काकली' नाम से 1935 ई० में प्रकाशित हुआ। 'काकली' के गीत जयदेव के 'गीतगोविंद' की तरह मधुर और कोमल थे, लेकिन उसकी विषयवस्तु आधुनिक थी। निराला ने जब 'काकली' को पढ़ा तो वे चमत्कृत हुए। 'काकली' के गीतों में उन्हें अपने 'तारुण्य की झलक' मिली। उन्होंने शास्त्री जी को पत्र लिखा और कुछ दिनों बाद वे आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास में शास्त्री जी से जाकर मिले। निराला की प्रेरणा से वे हिंदी में काव्य-रचना की ओर प्रवृत्त हुए। 'रूप-अरूप' नाम से हिंदी में उनका प्रथम काव्य-संग्रह 1939 ई० में प्रकाशित हुआ। और इस तरह हिंदी कविता की दुनिया में उनका प्रवेश हुआ। 'रूप-अरूप' के बाद 'तीरतरंग', 'अवंतिका', 'शिप्रा', 'मेघगीत', 'उत्पलदल', 'संगम', 'राधा' आदि दर्जन भर से ऊपर काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। 'राधा' अपने ढंग का हिंदी का सबसे बड़ा महाकाव्य है, जो जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनात्मकता का शिखर है। कविता के अतिरिक्त जानकीवल्लभ शास्त्री ने और कई विधाओं में साहित्य रचना की। गीति-नाट्य, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संस्मरण आदि विधाओं में उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। कविता की तरह अन्य विधाओं में भी शास्त्री जी के लेखन का अपना वैशिष्ट्य है। संस्मरण लेखन के क्षेत्र में 'स्मृति के वातायन', 'हंसबलाका', 'अष्टपदी', 'कर्मक्षेत्रे मरुक्षेत्रे' आदि पुस्तकें विशेष रूप में याद की जाएँगी। 'हंसबलाका' हिंदी संस्मरण साहित्य को शास्त्री जी की अन्यतम देन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1982 ई० में हुआ था। प्रकाशित होने पर हिंदी समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि महान् लेखकों के जीवन और साहित्य को तथा स्वयं अपने जीवन को नए ढंग से देखने का यह प्रयास अपने तरह का अकेला है। यह मात्र संस्मरण की पुस्तक भर नहीं है। यहाँ हिंदी के सांस्कृतिक गद्य का ऐसा रूप है, जिसमें हमारी परंपरा और समय दोनों अपने सबसे उदात्त रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इन संस्मरणों में प्राचीन भारत की गूँज अनुगूँज तो है ही, आधुनिक सांस्कृतिक जगत् की यथार्थ चेतना भी है। 'हंसबलाका' के संस्मरणों से गुजरते हुए हम आलोच्य व्यक्ति को तो नए रूप में देखते ही हैं, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सर्वथा नए रूप में पाते हैं। बिना किसी दुविधा के कहा जा सकता है कि 'हंसबलाका' के प्रकाशन से हिंदी संस्मरण साहित्य का सबसे पुष्ट और प्रखर रूप सामने आता है। 'हंसबलाका' हिंदी संस्मरण साहित्य का सर्वोच्च शिखर है। 'हंसबलाका' का प्रथम संस्करण 'पूर्वोदय प्रकाशन' दिल्ली से निकला था। संस्करण समाप्त होने के बाद किन्हीं कारणों से दूसरा संस्करण नहीं प्रकाशित हो सका। पिछले कुछ वर्षों से यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक अप्राप्य थी। 'किताबघर प्रकाशन' से इसका दूसरा संस्करण निकल रहा है। इसकी छपाई का काम पिछले वर्ष शुरू हुआ है। शास्त्री जी की यह प्रिय पुस्तक थी। वे इसे पुनः प्रकाशित देखना चाहते थे। लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारी तत्परता के बावजूद उनके जीवनकाल में यह कृति प्रकाशित नहीं हो सकी। 7 अप्रैल, 2011 को लगभग छियानबे साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वे इसका प्रकाशित दूसरा संस्करण नहीं देख सके, इसका हमें खेद है। शास्त्री जी का संपूर्ण साहित्य नए सिरे से उनके प्रेमियों और पाठकों के लिए शीघ्र उपलब्ध हो जाए, यह उनके प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। फिलहाल 'हंसबलाका' की नई प्रति आपके हाथ में है। अपने गुरु की स्मृति को नमन करते हुए, मैं इस अवसर पर कहना चाहता हूँ कि मेरी कोशिश होगी कि शास्त्री जी का संपूर्ण साहित्य यथाशीघ्र हिंदी पाठक के लिए सुलभहो जाए। - गोपेश्वर सिंह Categories: Vani Prakashan, Memoirs Hansbalaka is available from Vani Prakashan. Explore this book and discover more titles from the Vani Prakashan collection.

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This edition

Publisher Vani Prakashan
ISBN9789362878908

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1 edition

Vani Prakashan Cover of हंसबलाका, Vani Prakashan edition
—ISBN 9789362878908
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Titleहंसबलाका
LanguageHindi
Editions1
PublishersVani Prakashan

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