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गुच्छा गुलज़ार (बॉक्स)

by Gulzar

Hindi 1 edition

विष्णु वामन शिरवाडकर 'कुसुमाग्रज' यदि मराठी काव्य और नाटक के क्षेत्र में दशकों से समादृत और अग्रगण्य रहे हैं, तो गुलज़ार हिन्दी कविता और उर्दू कहानी के साथ-साथ सिनेमा के ऐसे नवयथार्थवादी प्रतीक ठहरते हैं, जिनकी परम्परा की जड़ें कबीर और ग़ालिब से लेकर बिमल रॉय व हषीकेश मुखर्जी तक जाती हैं। कुसुमाग्रज जहाँ एक ओर अपनी कविता द्वारा सामाजिक जीवन में अन्याय, असमानता तथा अत्याचार से उपजे विद्रूप एवं उसके आन्तरिक द्वन्द्व का चित्रण करते हैं, वहीं दूसरी ओर गुलज़ार की कलम जीवन की बेहद मामूली चीज़ों में भी उदासी, खुशी, मिलन, विछोह, प्रेम, घृणा व दर्द की नितान्त निजी अभिव्यक्तियों ढूँढ़ने में उत्कर्ष पाती है। यह अकारण नहीं है कि कुसुमाग्रज के नाटकों के केन्द्र में सामान्यतः बाजीराव, झाँसी की रानी, ययाति जैसे ऐतिहासिक व मिथकीय चरित्र होते हैं और गुलज़ार की फिल्मों का संवेदनात्मक कौशल मीरा के चरित्र, शरतचन्द्र के उपन्यास एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर व समरेश बसु की कहानियों से अपना आकाश विशद करता है। एक तरह से दोनों ही कला और साहित्य की सन्धि पर खड़े हुए भाषा व शब्दों का कुशल स्थापत्य रचते हैं। दोनों ही मूर्धन्यों ने अपनी सहज रचनात्मकता द्वारा, अपने सांस्कृतिक प्रदेय द्वारा तथा अपनी सूझबूझ, लय, कविता एवं विचार के द्वारा साहित्य की दुनिया को बड़ा और अद्वितीय बनाया हुआ है। उर्दू और हिन्दी की दहलीज़ पर खड़े हुए शायर और गीतकार गुलजार का तआरुफ ही यही है कि वे अपनी शायरी और नज़्मों को थोड़ा हिचकते हुए हिन्दी में 'संग्रह-निकालना' कहते हैं। मसला यह कि उर्दू और हिन्दी के दोआबे में हिन्दुस्तानी अल्फ़ाज़ में पकने वाली उनकी कविता की फ़सल दरअसल हिन्दी में उतना ही संग्रह है, जितना कि वह उर्दू में नज़्मों की किताब। ऐसे में उनकी कविता, जो हिन्दी की ज़मीन से निकलकर दूर आसमान तक उर्दू की पतंग बनकर उड़ती है, उसका एक चुनिन्दा पाठ तैयार करना अपने आप में बेहद दिलचस्प और प्रासंगिक है। इस चयन की उपयोगिता तब और बढ़ जाती है, जब हम इस बात से रू-ब-रू होते हैं कि पिछले लगभग पचास बरसों में फैली हुई इस शायर की रचनात्मकता में दुनिया भर के रंग, तमाशे, जज़्बात और अफ़साने मिले हुए हैं। गुलज़ार की शायरी की यही पुख्ता जमीन है, जिसका ख़ाका कुछ पेंटिंग्स, कुछ पोर्ट्रेट, कुछ लैंडस्केप्स और कुछ स्केचेज़ से अपना चेहरा गढ़ता है। अनगिनत नज़्मों, कविताओं आरै ग़ज़लों की समृद्ध दुनिया है गुलज़ार के यहाँ, जो अपना सूफियाना रंग लिए हुए शायर का जीवन-दर्शन व्यक्त करती हैं इस अभिव्यक्ति में जहाँ एक ओर हमें कवि के अन्तर्मन की महीन बुनावट की जानकारी मिलती है, वहीं दूसरी ओर सूफियाना रंगत लिए हुए लगभग निर्गुण कवियों की बोली-बानी के करीब पहुँचने वाली उनकी आवाज़ या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव हमें एकबारगी उदासी में तब्दील होता हुआ नजर आता है। एक प्रकार का वीतरागी भाव या जीवन के गहनतम स्तर तक पहुँचा हुआ ऐसा अवसादी मन, जो प्रचलित अर्थों में अपना आशय विराग द्वारा व्यक्त करता है। उदासी की यही भावना और उसमें सूक्ष्मतम स्तर तक उतरा हुआ अवसाद-भरा जीवन का निर्मम सत्य, इन नज़्मों की सबसे बड़ी ताक़त बनकर हमारे सामने आता है। इस अर्थ में गुलज़ार की कविता प्रेम में विरह, जीवन में विराग, रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी और हमारे समय में अधिकांश चीज़ों के संवेदनहीन होते जाने की पड़ताल की कविता है। ज़ाहिर है, इस तरह की कविता में दुख और उदासी उसी तरह से अपना आश्रय पाते हैं, जिस तरह निर्गुण पदों और सूफ़ियाना कलामों में प्रेम और आत्मीयता के क्षण, पीड़ा का रूप धर कर अपनी परिभाषा गढ़ते हैं। आधुनिक उर्दू कविता में गुलज़ार शायद सबसे अधिक अननुमेय कवि हैं। उनकी काव्य यात्रा किसी पहाड़ी नदी की तरह है जिसे खुद पता नहीं होता कि उसे किन-किन वादियों से गुज़रना है, कहाँ-कहाँ झील बनानी है और किन दरख्तों की जड़ों को सींचना है। वह अपनी धुन में आगे बढ़ती जाती है और हर कदम पर एक नया, पहले से खूबसूरत और ज्यादा दिलचस्प लैंडस्केप छोड़ जाती है। इस घुमावदार और रोमांचक सफर में जो एक रंगत गुलजार की शाइरी का साथ कभी नहीं छोड़ती, वह है अपने आसपास से एक जज़्बाती रिश्ता। यह आसपास इतना विस्तृत है कि इसके दायरे में पेड़-पौधों, नदी-झरनों और इनसानी दुःखान्तों और मनोहरताओं से लेकर पूरी कायनात आ जाती है। दूसरी तरफ, इस मज़बूत रिश्ते में इतना खलूस है कि यथार्थ का हर पहलू कवि को अपना लगने लगता है। लेकिन जो चीजें उनके मुलायम मिज़ाज से मेल नहीं खातीं या जो यथार्थ इतना विकृत कर दिया गया है कि वह अयथार्थ में तब्दील हो गया है, उसके साथ भी वे पंजा नहीं लड़ाते, बल्कि अपने ख़ास हकीकी अन्दाज़ में उसकी पीठ पर हल्के-से अपने नाखून गड़ा देते हैं। पन्द्रह पाँच पचहत्तर की कविताएँ

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Publisher Vani Prakashan
ISBN9789352294886

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1 edition

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AuthorGulzar
LanguageHindi
Editions1
PublishersVani Prakashan

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