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चुप्पी प्रेम की भाषा है

by Ranjita Singh 'Falak'

Hindi 1 edition

"चुप्पी का संवाद ही प्रेम है प्रेम आदिकाल से कविता की आत्मा के रूप में अभिव्यक्ति का प्राण बनकर साहित्य की उद्भावनाओं में व्याप्त रहा है। प्रेम मनुष्य आत्मा की पुनर्रचना का एक मानसिक प्रयास है। कवि-मना रंजीता सिंह 'फलक' हमेशा इस कोशिश में रही हैं कि कविता की भाषा और उद्देश्य को एक नया चेहरा दिया जाय। उनकी भाषा कभी प्रेम को मनुष्य आत्मा के पुनर्निर्माण के रूप में देखती है, कभी कविता को जीवन के मुहावरों के रूप में देखती है। इतना ही नहीं, वह कविता की भाषा को एक सामाजिक प्रत्यय के रूप में भी देखती हैं। रंजीता सिंह ‘फ़लक’ सारी नैतिकताओं को मनुष्य होने की प्रांजलताओं में बदल देती हैं। उन्हें कविता की भाषा ढूँढ़ने प्रकृति में नहीं जाना पड़ता । उनके लिए मनुष्यों का संसार ही बहुत बड़ी प्राकृतिक दुनिया सामने ला देता है। वे प्रेम में जिस चुप्पी की बात करती हैं, वही एक संवाद रच देती है। चुप्पी का संवाद और उसकी अनुभूति ही प्रेम का आत्मिक प्रत्यय बन जाता है। उनके यहाँ सब कुछ देखने वाली आँख भी मात्र एक चाक्षुष बिम्ब नहीं बनती बल्कि वह एक निर्निमेष दृष्टि बन जाती है। आँखें देखती ही नहीं, डुबो भी देती हैं। उनकी काव्य-प्रवृत्ति में मनुष्य जीवन ही एक बहुत बड़ी संकटापन्न स्थिति है, जो हमें कभी जीवन के सौन्दर्य से बहलाता है, कभी जीवन को विडम्बनाओं के समुद्र में उतार देता है। पर अनुभव की उदारता और जीवन के प्रति सकारात्मकता बची रहती है। प्रेम कभी पलायित या पराजित नहीं होता। प्रेम अपनी रहस्यात्मक मोहकता लिए बचा रहता है, मन्द-मन्द मुस्काता, थिर-स्थिर। रंजीता सिंह ‘फ़लक’ प्रेम की चुप्पी से जीवन का एक महाभारत बनाती हैं और उसे आत्मा के अनुभव में बदल देती हैं। वे प्रकृति की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और सृष्टि को अपनी कविता में लाना चाहती हैं। मैं उन्हें न केवल इस कविता-संग्रह के लिए, बल्कि भविष्य के समस्त अभिव्यक्ति के संसार को कविता में लाने के जोखिम-भरे प्रयत्नों की बधाई देता हूँ। अभिव्यक्ति ही है, जो रचनाकार को रचना जैसा बड़ा जीवन देती है शुभकामनाओं के साथ। —लीलाधर जगूड़ी ★★★ प्रेम की अनुभूतियों का अप्रत्याशित संयोजन देश की प्रख्यात कवि रंजीता सिंह ‘फ़लक' की नवीनतम कविताओं का यह स्तबक प्रेम की रंगबिरंगी अनुभूतियों का अप्रत्याशित, मनोहारी संयोजन है, जो स्वयं कवि की सृजनशीलता का उत्कर्ष तो है ही, उनकी समकालीन कविता का भी एक नया शृंग है। प्रेम की समस्त दशाओं, विवस्थाओं की प्रस्तुति विरल है। रंजीता जी परिणय की ऋजु भावनाओं के साथ-साथ बिछोह, विरह, सतत काम्य मिलन, अकेलापन तथा निःश्वास के निर्वात को तीव्रता से व्यंजित करने की अमोघ शक्ति से सम्पन्न कवि हैं। काव्य उच्छ्वास ऐसे कि पाठक विगलित हो जाये और बार-बार स्वयं के रहस्यमय आन्तरिक लोक को अनावृत होते हुए देखे। चुप्पी प्रेम की भाषा है, लेकिन यह चुप्पी इतनी विषादपूर्ण है कि संवेदनशील पाठक भी स्तब्ध रह जाने को विवश हो जाता है। आजकल 'प्रेम' पुनः प्रचलन में है परन्तु रंजीता सिंह 'फलक' में जो विस्मयबोध और चारुता है, वह नितान्त अनूठी है। यह कविता उनके हृदय का कार्डियोग्राम है। आशा है कि सहृदय पाठक इस संग्रह को अंगीकार करेंगे। और रंजीता सिंह 'फलक' भारतीय उपमहाद्वीप के काव्य-लोक को अपने काव्य रंगों से निरन्तर रंजित करती रहेंगी। —अरुण कमल ★★★ एक के बहाने सारा संसार अपना रंजीता का यह संग्रह इसी अर्थ में विशिष्ट है कि यह स्त्री-मन की विशिष्टता रेखांकित करता है कि प्रेम किससे हुआ, यह बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता, एक बार अगर प्रेम के आइडिया से भी प्रेम हो गया तो फिर एक के बहाने सारी दुनिया अपनी-अपनी लगने लगती है, कोई पराया रह नहीं जाता, ‘यह ग़म मेरा है, यह ज़माने का है, यह राहत वस्ल की है, यह किसी और कृत्य की है'—इसका फ़र्क़ वह नहीं करतीं। इसी अर्थ में स्त्री-विमर्श कहता है—‘पर्सनल इज़ पोलिटिकल!' रंजीता की नायिका इसका मर्म बख़ूबी समझती है। जो बात इसकी गीतात्मक संवेदना को आधुनिक तेवर देती है, वह है निम्न मध्यवर्गीय स्त्री, सब लेट स्पेस में अकेली रहने वाली विस्थापित स्त्री के दैनन्दिन संघर्षों की अन्तरंग झलक, एक ऐसे समाज में किसी तरह रोज़ी-रोटी जुटाते हुए अपनी धुन में रहते चले जाने का फ़ैसला जो उसे न सीधी आँख देखता है, न सीधे मुँह बात करता है। —अनामिका " Categories: Vani Prakashan, Poetry, New Arrivals Chuppi Prem Ki Bhasha Hai is available from Vani Prakashan. Explore this book and discover more titles from the Vani Prakashan collection.

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This edition

Publisher Vani Prakashan
ISBN9789362873958

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—ISBN 9789362873958
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Titleचुप्पी प्रेम की भाषा है
LanguageHindi
Editions1
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